अस्थि सन्धि किसे कहते हैं? । Bone Joint in Hindi

सन्धि या अस्थि सन्धि । Bone Joint in Hindi

हेलो दोस्तों, हमारे इस ब्लॉग में आपका स्वागत है, हमारे इस ब्लॉग में आज हम आपको सन्धि किसे कहते हैं? । Bone Joint in Hindi, सन्धि के प्रकार, अस्थि किसे कहते हैं? । Bone definition in Hindi, अस्थि की संरचना आदि के बारे में बताएंगे, तो चलिए दोस्तों इन सबके बारे में जानते है।

अस्थि सन्धि किसे कहते हैं? । Bone Joint in Hindi

सन्धि या अस्थि सन्धि ।  Bone Joint in Hindi
सन्धि या अस्थि सन्धि । Bone Joint in Hindi

वह स्थान जिस पर दो या दो से अधिक अस्थियाँ मिलती हैं, अस्थि सन्धि कहलाती है। दूसरे शब्दों में ”जहाँ पर दो या अधिक अस्थियों आपस में इस प्रकार मिलें कि उनमें गति हो सके, वह स्थान अस्थि सन्धि कहलाता है।”

अस्थि सन्धि के प्रकार Types Of Bone Joints In Hindi

सन्धि या अस्थि सन्धि ।  Bone Joint in Hindi

अस्थि सन्धियाँ निम्नलिखित 3 प्रकार की होती हैं।

(1) पूर्ण या चल सन्धि । Complete or Perfect joints In Hindi

वह अस्थि सन्धि जिसको बनाने वाली अस्थियों में गति होती है और इन्हें विभिन्न दिशाओं में घुमाया जा सकता है। इस अस्थि सन्धि को बनाने वाली अस्थियों के सिरों पर उपास्थि की एक-एक पतली परत पायी जाती है, जिसे सन्धि-उपास्थि कहते हैं। दोनों ‘सन्धि उपास्थियों के बीच एक गुहा स्थित होती है जिसे सन्धि गुहा कहते हैं। इस गुहा के चारों तरफ एक पतली झिल्ली सिनोवियल झिल्ली पायी जाती है, इस झिल्ली के मध्य में सिनोवियल द्रव नामक एक पतला द्रव भरा रहता है। इस प्रकार सन्धि स्थान पर स्थित गुहा द्रव तथा झिल्ली को एक साथ सिनोवियल सम्पुट कहते हैं। इस प्रकार के जोड़ों पर अस्थियों को एक स्थान पर बनाये रखने के लिये जोड़ों के चारों तरफ लचीले तन्तु या लिगामेण्ट्स स्थित होते हैं जिनके कारण ही अस्थियाँ जोड़ पर हिल तो सकती हैं। लेकिन जोड़ से हट नहीं सकती।

गति की प्रकृति के आधार पर चल सन्धियाँ निम्नलिखित 5 प्रकार की होती हैं।

(I) पता गेंद और प्याला – इस प्रकार की सन्धि की एक अस्थि में प्याले के समान त दूसरी अस्थि में एक गेंद के समान उभार पाया जाता है। गेंद, प्याले में कुछ इस प्रकार फिट होती हैं कि गेंद युक्त अस्थि को प्याले में कई दिशाओं में घुमाया जा सकता है। अंश मेखला की ग्लीनॉयड गुहा तथा श्रोणि मेखला की एसीटाबुलम के साथ क्रमश: हयूमरस तथा फीमर अस्थियों का सिर इसी प्रकार की सन्धि बनाता है।

(II) कब्जा सन्धि – इस प्रकार की सन्धि को अस्थियों में गति केवल एक दिशा में ही होती है, लेकिन एक निश्चित सीमा के बाद गति नहीं हो सकती। जैसे – कुहनी सन्धि (Elbow joint), घुटनों की सन्धि (Knee joint), कलाई की सन्धि तथा हाथ की अन्य अंगुलियों के बीच की सन्धियाँ।

(III) प्रसर या फिसलन सन्धि – इस प्रकार की सन्धि में स्थित अस्थियाँ एक-दूसरे के ऊपर एक निश्चित सीमा तक सभी दिशाओं में फिसल सकती हैं, लेकिन ये मुड़ नहीं सकती। कशेरुकी जन्तुओं की कशेरुकाओं के प्री तथा पोस्ट जाइगैपोफाइसिस के बीच इस प्रकार की सन्धियाँ पायी जाती हैं। रेडियस तथा अल्ना अस्थियाँ भी इसी प्रकार की सन्धि बनाती हैं।

(IV) धुरी सन्धि – इस प्रकार की सन्धि में एक अस्थि में एक नुकीला उभार पाया जाता है तथा दूसरी अस्थि में इस उभार के लिये गड्ढा पाया जाता है। पहली अस्थि के उभार के साथ दूसरी का गड्ढा इस प्रकार फिट होता है कि इसे उभार पर धुरी के समान घुमाया जा सकता है। स्तनियों को दूसरी कशेरुका के ऑडोण्टॉएड प्रवर्ध और एटलस के बीच इसी प्रकार का जोड़ पाया जाता है, जिससे सिर को घुमाया जाता है।

(v) सैंडल सन्धि – वह सन्धि है, जिसमें एक अस्थि का उभार दूसरी अस्थि के गड्ढे में घूमता तो है, लेकिन ठीक से नहीं घूम पाता। हमारे अंगूठे की कार्पल्स तथा मेटाकार्पल्स में इसी प्रकार की सन्धि पायी जाती है।

(2) अपूर्ण सन्धि । Imperfect Joint In Hindi

इस प्रकार की अस्थि सन्धि में सन्धि बनाने वाली अस्थियों के बीच सिनोवियल सम्पुट और लिगामेण्ट्स नहीं पाये जाते। सिनोवियल सम्पुट के स्थान पर एक पतली कालेज की पट्टी पायी जाती है जिसके कारण इस जोड़ को बनाने वाली अस्थियों में थोड़ी-सी ही गति हो सकती है। कशेरुकाओं के बीच की सन्धियों तथा इलियम एवं सैकल कशेरुकाओं के अनुप्रस्थ प्रवधों के बीच इस प्रकार की सन्धि पायी जाती है। इसके अलावा अंश तथा श्रोणि मेखला की कुछ सन्धियाँ भी इसी प्रकार की होती हैं

(3) अचल सन्धि । Immovable or Fixed joint In Hindi

इस सन्धि को बनाने वाली अस्थियाँ इस प्रकार से जुड़ी होती हैं कि इनमें थोड़ी सी भी गति नहीं हो सकती। इस सन्धि को बनाने वाली अस्थियाँ आपस में बहुत पास-पास स्थित होती हैं। जैसे हमारी खोपड़ी की अस्थियाँ आपस में आरी के समान के जोड़ों द्वारा जुड़ी होती हैं। इन्हें आसानी से खोला या खींचा नहीं जा सकता। मेखलाओं की अस्थियों में भी कुछ ऐसे ही जोड़ पाये जाते हैं।


अस्थि किसे कहते हैं? । Bone definition in Hindi

सन्धि या अस्थि सन्धि ।  Bone Joint in Hindi
सन्धि या अस्थि सन्धि । Bone Joint in Hindi

अस्थि एक कठोर, ठोस और मजबूत संयोजी ऊतक है, जो अन्य संयोजी ऊतकों के समान कोशिकाओं, तन्तुओं और आधात्री का बना होता है। इसकी आधात्री ओसीन तथा कई अन्य प्रोटीनों जैसे — ओसियोम्यूकाइएड, ओसियोएल्बूमोनाएड की बनी होती है। इसका लगभग 30% भाग प्रोटीन का ही बना होता है।

इसके आधात्री में कोलेजन तन्तु एवं अस्थि कौशिक व्यवस्थित रहती हैं। इन सबके अतिरिक्त अन्य संयोजी ऊतकों के विपरीत अस्थियों में आधात्री के कैल्सियम और मैग्नीशियम के अकार्बनिक लवण पाये जाते हैं, इन्हीं लवणों के कारण ही अस्थि कठोर हो जाती हैं। अस्थियों के आधात्री में कुछ कार्बनिक लव भी अल्प मात्रा में पाये जाते हैं। जब अस्थियों को जलाया जाता है. तो कार्बनिक लवण धुआँ बनकर निकल जाती हैं जबकि अकार्बनिक वस्तुएँ राख के रूप में शेष रह जाती हैं।

यदि किसी जन्तु की अस्थि को तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल कुछ देर के लिए रखा जाये तो रासायनिक क्रिया के कारण अस से अकार्बनिक लवण निकल जाते हैं फलत: अस्थि लचीली होती हैं और इसे सरलता से मोड़ा जा सकता है। इसी कारण जब बच्चों में कैल्सियम की कमी होती है तो उनकी अस्थियाँ कमजोर और टेढ़ी हो जाती हैं और ऐसे बच्चे अपंग हो जाते हैं।

अस्थि की संरचना । Bone Structure in Hindi

सन्धि या अस्थि सन्धि ।  Bone Joint in Hindi

संरचनात्मक दृष्टि से अस्थियाँ आधात्री, कोलेजन तन्तु, अस्थि कोशिकाओं और कैल्सियम तथा मैग्नीशियम लवणों की बनी होती हैं। अस्थियों का लगभग 50% भाग आधात्री ही होता है। और आधात्री में कोलेजन तन्तु स्थित होते हैं, इन्हीं कोलेजन तन्तुओं के ऊपर लवण जमे रहते हैं। यदि हाइड्रोक्लोरिक अम्ल में इबाई किसी जन्तु की अस्थि (डी-कैल्सीफाइड अस्थि) के अनुप्रस्थ काट को देखें तो इसमें निम्न संरचनायें दिखाई देती हैं—

(1) पेरी ऑस्टियम (Periosteum) – प्रत्येक अस्थि के चारों तरफ तन्तुमय संयोजी उतक का बना एक दोहरा आवरण पाया जाता है जिसे परिअस्थिक (Perios teum) कहते हैं। इसी आवरण के द्वारा टेण्डन्स, लिगामेण्ट्स तथा दूसरी पेशियाँ जुड़ी होती हैं।

(2) अस्थि कोशिकायें या ऑस्टियो साइट्स (Bone cells or Osteocytes) – परि अस्थिक की आन्तरिक सतह पर एक कोशिका स्तर की मोटी सतह पायी जाती हैं, इन कोशिकाओं को आस्टियोसाइट्स कहते हैं। ये कोशिकाएँ ओसीन प्रोटोन का स्त्रावण करती हैं जो धारियों में व्यवस्थित होकर बाहर से आधात्री का निर्माण करती हैं।

परिअस्थिक आवरण की बाहरी स्तर असंख्य तन्तुओं की बनी होती है, इसे तन्तुमय स्तर (Fibrous layer) कहते हैं।

(3) आधात्री (Matrix) – अस्थि के परिअस्थिक आवरण के अन्दर धारियों में व्यवस्थित आधात्री पायी जाती है, इन धारियों को पटलिकाएँ कहते हैं। इन पटलिकाओं में बहुत से शाखित खाली स्थान व्यवस्थित होते हैं, जिन्हें गर्तिकाएँ तथा इनकी शाखाओं को कैनालीकुली कहते हैं। गर्तिकाओं में इन्हीं के समान शाखित कोशिकाएँ स्थित होती हैं जिन्हें आस्टियोसाइट्स तथा इनकी शाखाओं को जीवद्रव्यी प्रवर्ध कहते हैं। पटलिकाओं की गर्तिकाएँ आपस में कैनालीकुली द्वारा जुड़ी होती हैं। कैनालीकुली कोशिकाओं के बीच संवहन का कार्य करती है।

(4) मज्जा गुहा (Marrow Cavity) – मोटी तथा लम्बी अस्थियों के बीच में एक खोखली गुहा पायी जाती है, जिसे मज्जा गुहा कहते हैं। इसमें एक मुलायम पदार्थ भरा रहता है, इसे अस्थि मज्जा कहते हैं। अस्थि मज्जा में वसा कोशिकाएँ, रुचिर वाहिनियाँ तथा तन्त्रिकाएँ पायी जाती हैं। अस्थि मज्जा हड्डियों के सिरों पर लाल तथा मध्य में पीली होती हैं। इन्हें क्रमश: लाल अस्थि मज्जा तथा पीली अस्थि मज्जा कहते हैं। पीली अस्थि मज्जा वसा के संग्रह के साथ श्वेत रुधिर कणिकाओं (W.B.Cs.) का निर्माण करती है। जबकि लाल अस्थि मज्जा लाल रुधिर कणिकाओं (R.B.Cs.) का निर्माण करती है। लाल अस्थि मज्जा केवल स्तनियों में पायी जाती है। अस्थि मज्जा के चारों तरफ या आधात्री की आन्तरिक सतह पर भी एक तन्तुमय संयोजी ऊतक का आवरण पाया जाता है जिसे अन्तः अस्थिक (Endosteum) कहते हैं, इसमें भी आस्टियोब्लास्ट कोशिकाएँ एक स्तर में व्यवस्थित होती हैं जो ओसीन का स्रावण करके अन्दर से आधात्री को धारियों के रूप में बढ़ाती हैं। इस प्रकार अस्थि, आधात्री के दोनों तरफ से मोटाई में बढ़ती है। पतली अस्थियों (जैसे- सिर की) में अस्थि मज्जा नहीं पायी जाती। मेढक तथा कुछ कम विकसित कशेरुकियों की अस्थियों में पोषक पदार्थों को लाने वाली रुधिर वाहिनियाँ मज्जा गुहा या परिस्थिक झिल्लियों पर फैली रहती हैं, लेकिन स्तनियों में ये अस्थियों में प्रवेश करके मज्जा गुहा तथा सारे आधात्री में फैल जाती हैं। इन रुधिर वाहिनियों के लिए आधात्री में अस्थि को लम्बाई में बहुत सी नलिकाएँ बन जाती हैं, जिन्हें हैवर्सियन नलिकाएँ कहते हैं। प्रत्येक हैवर्सियन नलिका के चारों तरफ 8-15 तक पटलिकाएँ व्यवस्थित होती हैं। हैवर्सियन नलिकाओं तथा पटलिकाओं को एक साथ हैवर्सियन तन्त्र (Haversian system) कहते हैं। एक हैवर्सियन नलिका तथा इसके चारों तरफ की पटलिकाओं और उसमें स्थित आस्टियोसाइट्स अस्थि की रचनात्मक इकाई बनाती हैं, जिसे आस्टिओन (Osteon) कहते हैं। हैवर्सियन नलिकाएँ आपस में एक-दूसरे से तथा अस्थि के बाहर और भीतर की ओर स्थित रुधिर वाहिनियों से कुछ आड़ी तिरछी नलिकाओं द्वारा जुड़ी होती हैं। ये नलिकाएँ वोल्कमान नलिकाएँ (Volkmann canals) कहलाती हैं।

लम्बी अस्थियों के लम्ब काट के अध्ययन से पता चलता है कि प्रत्येक लम्बी अस्थि दो प्रकार के ऊतकों की बनी होती है-

(a) संहत अस्थि (Compact bone) – यह अस्थि की बाहरी सतह पर स्थित होता है और हैवर्सियन तन्त्र का बना होता है। इसके अन्दर अवकाश नहीं पाये जाते।

(b) स्पंजी अस्थि (Spongy bone) – यह भाग लम्बी अस्थियों के सिरों पर तथा अन्दर गहराई में पाया जाता है । इस भाग में अनेक छोटे-छोटे अवकाश पाये जाते हैं। इन अवकाशों में ही अस्थि मज्जा (Bone marrow) भरी होती है।

पूर्ण स्पन्जी अस्थियों के चारों तरफ संहत अस्थि का आवरण पाया जाता है। लम्बी अस्थियों के सिरे एवं खोपड़ी की चपटी अस्थियाँ स्पन्जी अस्थियों के उदाहरण हैं। इनके ऊपर तथा नीचे संहत अस्थि का आवरण पाया जाता है।

अस्थियों के प्रकार । Types of Bones in Hindi

सन्धि या अस्थि सन्धि ।  Bone Joint in Hindi

विकास के आधार पर अस्थियाँ 2 प्रकार की हो सकती है।

(1) कलाजात या मेम्ब्रेन या इनवेस्टिंग अस्थि (Membra nous or Investing bone) – यह अस्थि भ्रूण की त्वचा के नीचे स्थित संयोजी ऊतक की झिल्लियों में कुछ परिवर्तनों के परिणामस्वरूप बनती है। खोपड़ी की समस्त चपटी अस्थियाँ कलाजात ही होती हैं। जिस भाग में कलाजात अस्थि को बनना होता है सर्वप्रथम उस भाग की रुधिर वाहिकाएँ एक महीन जाल और वहाँ की मिसेनकाइमा कोशिकाएँ फाइब्रोब्लास्ट कोशिकाएँ बना देती हैं। इस जाल के अन्दर चारों तरफ कैल्सियम लवणों का आवरण बन जाता है। फाइब्रोब्लास्ट कोशिकाएँ इसी समय ओसीन प्रोटीन और ऑस्टिोब्लास्ट कोशिकाओं का निर्माण करने लगती हैं। ऑस्टियोब्लास्ट की बाहरी स्तर पेरी ऑस्टियम तथा आन्तरिक स्तर एण्डोऑस्टियम बना देती है। इस प्रकार से बनी अस्थियाँ त्वचा से दूर अन्दर की ओर आकर कोमल उपास्थिमय भागों पर निवेशित (hivest) हो जाती हैं और इसे दृढ़ बना देती हैं।

(2) उपास्थिजात या रिप्लेसिंग अस्थि (Cartilage or Re placing bone) – ये अस्थियाँ हमेशा भ्रूण की उपास्थि को नष्ट करके उन्हीं के स्थान पर बनती हैं। पैरों तथा कशेरुक दण्ड की हड्डियाँ इसी प्रकार की होती हैं। सभी लम्बी अस्थियाँ उपाि ही होती हैं।

इनके निर्माण के समय उपास्थि कोशिकाओं का तीव्रता से विभाजन होने लगता है। फलतः नयी बनी कोशिकाएँ चारों तरफ फैल जाती हैं। इसी समय आधात्री में कैल्सियम का जमाव होने लगता है जिससे यह कठोर हो जाता है। पेरिकॉण्ड्रियम कोशिकाएँ ऑस्टियोब्लास्ट (Osteoblast) के समान कार्य करने लगती हैं। और ओसीन का निर्माण करती हैं। इस ओसीन में नयी बनी कोशिकाएँ फँसकर गर्तिकाएँ (Lacunae) बनाने लगती हैं। पेरिकॉड्रियम पेरिऑस्टियम कलिकाओं के रूप में उपास्थि के अन्दर धँसने लगता है। इन कलिकाओं के अन्दर रुधिर वाहिनी और ऑस्टियोब्लास्ट कोशिकाएँ एकत्रित होकर प्राथमिक मज्जा गुहा बना देती हैं, जो आपस में मिलकर केन्द्रीय मज्जा गुहा का निर्माण करती हैं । गुहा की आन्तरिक कोशिकाएँ एण्डोऑस्टीयम बना देती है, फलतः उपास्ति अस्थि में जाती है ।

‌अस्थियाँ और उपास्थियाँ जन्तुओं के शरीर का ढाँचा बनाती हैं तथा उनको एक निश्तिच आकार देती हैं।

दोस्तों, आज हमने आपको सन्धि किसे कहते हैं? । Bone Joint in Hindi, सन्धि के प्रकार, अस्थि किसे कहते हैं? । Bone definition in Hindi, अस्थि की संरचना आदि के बारे मे बताया, आशा करता हूँ आपको यह आर्टिकल बहुत पसंद आया होगा, तो दोस्तों मुझे अपनी राय कमेंट करके अवश्य बताये, ताकि मुझे और अच्छे आर्टिकल लिखने का अवसर प्राप्त हो, धन्यवाद्.

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