मुगल साम्राज्य का इतिहास (हिन्दी में)। The Mughal Empire In Hindi

हेलो दोस्तों, हमारे इस ब्लॉग में आपका स्वागत है। हमारे इस ब्लॉग में आपको मुगल साम्राज्य का संपूर्ण इतिहास। Mughal Empire In Hindi, बाबर, हुमायूँ , शेरशाह सूरी, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब आदि के बारे में बताएंगे, तो दोस्तों एक एक करके इन सबके बारे में जानते है।

बाबर (1526 – 1530 ई.)

जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर का जन्म 1483 ई. में मध्य एशिया के एक छोटे-से राज्य फरगना में हुआ। वह तैमूर और चंगेज खां का वंशज था। जब वह 11 वर्ष 4 मास का ही था, उसके पिता उमर शेख मिर्जा का देहान्त हो गया तथा बाबर राजात बना। 1497 ई० में बाबर ने समरकन्द को जीता जब बाबर फरगना को प्राप्त करने समरकन्द से चला तो समरकन्द पर उसके चचेरे भाई अली ने अधिकार कर लिया। अतः फरवरी 1498 ई. में बाबर को एक वर्ष से अधिक समय तक खानाबदोशों वाला जीवन व्यतीत करना पड़ा। 1499 ई. में उसने फरगना की राजधानी पर पुनः अधिकार कर लिया। 1500 ई. में उसने समरकन्द पर भी अधिकार कर लिया, किन्तु उजबेगों ने उसे समरकन्द छोड़ने पर बाध्य कर दिया। उसी वर्ष फरगना भी उसके हाथ से निकल गया।

1504 ई. में वह काबुल पर अधिकार करने में सफल हो गया। फिर उसने कन्थार व हेरात पर भी विजय प्राप्त की। शैवानी की मृत्यु के पश्चात् 1516 ई. में बाबर ने एक बार फिर समरकन्द पर विजय प्राप्त की, किन्तु यह विजय स्थायी सिद्ध न हुई। 1507 ई. में उसने अपने पूर्वजों की उपाधि ‘मिर्जा’ को त्याग कर ‘पादशाह’ की उपाधि धारणकी। अब बाबर ने भारत की और ध्यान दिया। 1519 ई. में बाबर ने भेरा, खुशाव और चेनाब के प्रदेशों पर विजय प्राप्त की। 1520 ई. में उसने बदख्शां को जीत कर हुमायूं के हवाले कर दिया तथा 1522 ई. में कन्धार को जीत कर कामरान को सौंप दिया। 1524 ई. में बाबर ने लाहौर को जीत कर सुल्तान इब्राहिम लोदी के चाचा अलाउद्दीन को सौंप दिया, किन्तु अलाउद्दीन को दौलत खां लोदी ने काबुल भगा दिया।

1. पानीपत का प्रथम युद्ध (1526 ई. )

नवम्बर, 1525 ई. को बाबर ने 12,000 घुड़सवारों के साथ भारत की ओर कूच किया और तीन सप्ताह में ही उसने पंजाब पर अधिकार कर लिया। 21 अप्रैल, 1526 ई. को इब्राहिम लोदी और बाबर की सेनाएं पानीपत के मैदान में आमने-सामने हुई। बाबर की सैन्य संख्या इब्राहिम लोदी से कम थी। बाबर ने युद्ध में ‘तुलगमा रणपद्धति’ को अपनाया। युद्ध क्षेत्र में उसने सेना को तीन भागों में विभाजित किया। अपने पुत्र हुमायूं को दाहिने भाग का व सुल्तान मिर्ज़ा को बायें भाग का नेतृत्व सौंपा। मध्य भाग स्वयं बाबर ने दो निपुण तोपचियों अली और मुस्तफा की मदद से सम्भाला।

21 अप्रैल, 1526 को बाबर की सेना ने इब्राहिम की सेना पर हमला कर दिया। इब्राहिम पराजित हुआ और रणभूमि में ही मारा गया। दिल्ली और आगरा पर बाबर का अधिकार हो गया तथा उसने स्वयं को हिन्दुस्तान का बादशाह घोषित किया। इस प्रकार भारत में मुगल वंश की स्थापना हुई। भारत विजय के उपलक्ष्य में बाबर ने प्रत्येक काबुल निवासी को एक-एक चांदी का सिक्का उपहार स्वरूप दिया। उसकी इस उदारता के कारण उसे ‘कलन्दर’ उपाधि दी गई।

2. खानवा का युद्ध (1527 ई.)

खानवा का युद्ध बाबर व मेवाड़ के राणा सांगा (राणा संग्राम सिंह ) के बीच हुआ। बाबर ने राणा सांगा पर आरोप लगाया कि उसने अपने वायदे के अनुसार इब्राहिम लोदी के विरुद्ध युद्ध में बाबर की सहायता नहीं की। 16 मार्च, 1527 ई. को बाबर की सेना फतेहपुर सीकरी के निकट खानवा या कनवाहा के मैदान में पहुंची। 17 मार्च को युद्ध आरम्भ हुआ। राणा सांगा का साथ मारवाड़, ग्वालियर, आम्बेर, अजमेर, हसन खां मेवाती, वसीन चंदेरी एवं इब्राहिम का भाई महमूद लोदी दे रहे थे। बाबर ने राणा सांगा के विरुद्ध ‘जिहाद’ की घोषणा की। 20 घंटे के भीषण युद्ध के पश्चात् बाबर को विजय प्राप्त हुई तथा उसने ‘गाजी’ की उपाधि धारण की।

3. चंदेरी का युद्ध (1528 ई.)

खानवा के युद्ध के पश्चात् राजपूतों की शक्ति पूर्णत: नष्ट नहीं हुई थी। राजपूतों की बची हुई सेना का चंदेरी के मेदनी राय ने नेतृत्व किया। बाबर ने मेदनी राय से अपनी अधीनता स्वीकार करने को कहा, जिसे मेदनी राय ने अस्वीकार कर दिया। 20 जनवरी, 1528 ई. को बाबर ने चंदरी पर आक्रमण कर दिया। चंदेरी के किले को बाबर ने जीत लिया तथा असंख्य राजपूत सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। राजपूत स्त्रियों ने ‘जौहर’ का मार्ग अपनाया। उसके पश्चात् बाबर की शक्ति को ललकारने के लिए कोई भी राजपूत सरदार शेष नहीं रहा।

4. घाघरा का युद्ध (1529 ई.)

अफगानों की शक्ति को बाबर ने पूर्ण रूप से घाघरा के युद्ध में कुचला। इब्राहिम लोदी के भाई महमूद लोदी ने बिहार पर अधिकार कर लिया। बाबर ने अपने पुत्र अस्करी को महमूद लोदी के विरुद्ध भेजा तथा स्वयं उसके पीछे चला। 6 मई, 1529 ई. को बाबर का अफगानों से घाघरा के स्थान पर युद्ध हुआ। बाबर का तोपखाना अफगानों के विरुद्ध अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ। बाबर ने बिहार को अपने अधीन कर लिया। 26 दिसंबर 1530 ई. को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गई। उस समय वह लगभग 48 वर्ष का था। उसे काबुल में दफनाया गया ।

बाबर

  1. मुग़ल साम्राज्य का संस्थापक बाबर था। इसने मुग़ल साम्राज्य की स्थापना के साथ ही इसे पादशाही की स्थापना की थी। इसलिए इसे बादशाह कहा जाने लगा।
  2. बाबर का जन्म फरबरी 1483 ई. में हुआ था। इसने 1507 ई. में बादशाह की उपाधि धारण की थी।
  3. इसके 4 पुत्र थे – हुमायूँ, कामरान, असकरी तथा हिंदाल।
  4. बाबर ने भारत पर 5 बार आक्रमण किया था।
  5. इसने पानीपत के प्रथम युद्ध में पहली बार तुगलमा युद्ध निति एवं तोपखाने का प्रयोग किया था।
  6. बाबर को अपनी उदारता के लिए कलंदर की उपाधि दी गयी।
  7. इसकी मृत्यु 26 दिसम्बर 1530 ई. आगरा में हुयी थी।इसके शव को प्रारम्भ में आगरा के आरामबाग में दफनाया गया और बाद में काबुल में दफनाया गया।
  8. बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा की रचना की थी।
  9. चारबाग बनाने की परम्परा की शुरुआत अकबर के समय से हुयी।
  10. बाबर को मुंबइयान नामक पदशैली का भी जन्म दाता माना जाता है।
  11. बाबर का उत्तराधिकारी हुमायूँ हुआ।

हुमायूं (1530-1556 ई.)

नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूं का जन्म 6 मार्च, 1508 ई. में काबुल में हुआ था। उसकी माता ‘महिम बेगम’ शिया मत में विश्वास रखती थी। हुमायूं, बाबर के चार पुत्रों- कामरान, अस्करी तथा हिन्दाल में सबसे बड़ा था। उसे ही बाबर ने अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। हुमायूं ने तुर्की, फारसी तथा अरबी का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया। उसने दर्शनशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, फलित तथा गणित का भी अच्छा ज्ञान प्राप्त किया। उसे प्रशासनिक प्रशिक्षण देने के लिए बाबर ने 1528 ई. में उसे बदख्शां का राज्यपाल नियुक्त किया। बाबर की मृत्यु के पश्चात् 30 दिसम्बर, 1530 ई. को 23 वर्ष की अवस्था में हुमायूं का राज्याभिषेक हुआ। अपने पिता के निर्देश के अनुसार उसने अपने छोटे भाइयों से उदारता का व्यवहार किया और कामरान को काबुल, कन्धार और पंजाब की सूबेदारी, अस्करी को संभल की सूबेदारी और हिन्दाल को अलवर की सूबेदारी प्रदान की। इस प्रकार हुमायूं ने नव निर्मित मुगल साम्राज्य को विभाजित करके बहुत बड़ी भूल की । कालान्तर में उसके भाई ही उसके विरुद्ध हो गए और उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उसके शासनकाल की प्रमुख घटनाएं इस प्रकार हैं।

1. कालिंजर का युद्ध (1531 ई.) 

1531 ई. में हुमायूं ने बुंदेलखण्ड में कालिंजर के किले को घेर लिया। यह विश्वास किया जाता है कि यहां का राजा प्रताप रुद्रदेव संभवतः अफगानों के पक्ष में था। मुगलों ने किले को घेर लिया, किन्तु हुमायूं को सूचना मिली कि अफगान सरदार महमूद लोदी बिहार से जौनपुर की ओर बढ़ रहा है तो वह कालिंजर के राजा से अपने पक्ष में संधि करके जौनपुर की ओर बढ़ गया।

2. चुनार का घेरा (1532 ई.)

अफगानों को पराजित करने के बाद हुमायूं ने शेर खां के अधीन चुनार के किले को घेर लिया। यह घेरा सितम्बर, 1532 ई. तक चलता रहा। इसी बीच गुजरात के शासक बहादुरशाह ने अपना दबाव बढ़ाना आरम्भ कर दिया। हुमायूं ने चुनार के किले को जीतने की बजाय “बिल्कुलनाममात्र की अधीनता स्वीकार कराने में ही संतोष कर लिया।” ऐसा करना हुमायु की एक भूल थी। 

3. बहादुरशाह से युद्ध (1535-1536 ई.)

गुजरात के शासक बहादुरशाह ने अपने राज्य की सीमाओं को बढ़ाया तथा दक्षिणी भारत के कई राज्यों से संधि कर ली। बहादुरशाह ने 1531 ई. में मालवा तथा 1532 ई. में रायसेन को विजित किया। उसने चित्तौड़ के शासक को भी संधि के लिए बाध्य किया। चित्तौड़ की राजमाता कर्णवती ने हुमायूं से सहायता की याचना की तथा उसे ‘राखी’ भी भेजी। हुमायूं ने राखी स्वीकार कर ली व चित्तौड़ की ओर प्रस्थान किया। बहादुरशाह और हुमायूं के मध्य 1535 ई. में ‘सारंगपुर’ (मालवा प्रदेश) में युद्ध हुआ, जिसमें हुमायू को विजय प्राप्त हुई। बहादुरशाह भाग खड़ा हुआ। हुमायू ने मांडू तथा चम्पानेर के किलों को भी जीत लिया। किन्तु, हुमायूं की यह विजय स्थाई सिद्ध नहीं हुई क्योंकि 1536 ई. में बहादुरशाह ने पुर्तगालियों की सहायता से मालवा तथा गुजरात पर फिर अधिकार कर लिया। फरवरी, 1537 ई. में बहादुरशाह की मृत्यु हो गई। 

4. शेर खां के साथ युद्ध (1537-1839 ई.)

गुजरात खोने के पश्चात् हुमायू एक वर्ष तक आगरा में रहा। यद्यपि उसे यह समाचार प्राप्त हो चुका था कि शेर खां बंगाल और बिहार में अपनी स्थिति दृढ़ कर रहा है, परंतु उसने उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की ।

1537 ई. में हुमायू ने चुनार के किले को घेर लिया तथा छह महीने तक इसे घेरे में रखा। अंततः वह इस पर अधिकार करने में सफल हो गया। इस समय का लाभ उठा कर शेर खां ने गौड़ के खजाने को रोहतास के किले में पहुंचा दिया। 

हुमायूं ने चुनार को जीत कर अपना ध्यान बंगाल की ओर दिया। गौड़ पहुंच कर वह रंगरलियों में डूब गया तथा उसने आठ महीने का समय नष्ट किया। इस बीच शेर खां ने अपनी स्थिति दृढ़ कर ली। जनवरी, 1539 ई. तक शेर खां ने कोसी और गंगा नदी के मध्य क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। जब हुमायूं ने मार्च, 1539 ई. में आगरा के लिए पुन: यात्रा प्रारम्भ की तो शेर खां ने उसके मार्ग को रोक लिया।

5. चौसा का युद्ध ( 1539 ई.)

हुमायूं और शेर खां की सेनाएं तीन महीने तक (1539 ई. अप्रैल तक) आमने-सामने डटी रहीं। यह विलम्ब शेर खां के हित में था, क्योंकि मुगलों के शिविर निचली सतह पर थे। अंतत: वर्षा आरम्भ हो गई और मुगलों के शिविर पानी से भर गये। हुमायूं की सेना में हड़बड़ी मच गई और ऊपर से शेर खां की सेना ने रात के समय उन पर आक्रमण कर दिया। 26 जून, 1539 को ‘चौसा का युद्ध’ हुआ। हुमायूं पराजित हुआ और एक भिश्ती की सहायता से उसने बड़ी कठिनता से अपनी जान बचाई। शेर खां ने शेरशाह की उपाधि धारण की व अपने नाम से खुतबे पढ़वाए और सिक्के ढलवाए |

6. कन्नौज का युद्ध (1540 ई.)

आगरा पहुंच कर हुमायूं ने फिर से युद्ध की तैयारी की। हुमायूं ने लगभग 40,000 सैनिकों के साथ शेरशाह के विरुद्ध कूच किया। मई, 1540 ई. में कन्नौज के स्थान पर घमासान युद्ध हुआ। मुगल तोपखाना युद्ध में न लाये जाने के कारण हानिकर सिद्ध हुआ। कन्नौज में भी हुमायूं ने पूरे एक महीने तक आक्रमण नहीं किया। इस युद्ध में भी वह पराजित हुआ और भगोड़ा बन गया। शेरशाह ने आगरा और दिल्ली पर अधिकार कर लिया।

हुमायूँ

  1. 1533 ई. में हुमायूँ ने दीनपनाह नामक नए नगर की स्थापना की थी।
  2. चौसा का युद्ध 25 जून 1539 ई. में शेर खां एवं हुमायूँ के बीच हुआ, इस युद्ध में शेर खां विजय रहा।
  3. बिलग्राम या कन्नौज युद्ध 17 मई 1540 ई. में शेर खां और हुमायूँ के बिच हुआ, इस युद्ध में  भी शेर खां विजय रहा।
  4. हुमायूँ की मृत्यु 1 जनवरी 1556 ई. में दीन पनाह भवन में स्थित पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरने के हुयी थी।
  5. हुमायूँनामा की रचना गुल-बदन-बेगम ने की थी।

शेरशाह सूरी

शेरशाह का असली नाम फरीद था। उसका जन्म 1472 ई. में पंजाब में हुआ था। उसके पिता हसन खां की चार पलियां और आठ पुत्र थे। 1494 ई. में यह सहसाराम (बिहार) छोड़कर जौनपुर चला गया। वहां उसने अरबी और फारसी की पुस्तकों-गुलिस्तां, बोस्तां, सिकन्दरनामा आदि का पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। कुशाग्रबुद्धि होने के कारण वह अपने पिता के आश्रयदाता जमात खां का विश्वास पात्र बन गया। 1497 ई. में उसके पिता ने उसे सहसाराम तथा गयासपुर के परगने का प्रबंधक नियुक्त किया। ये क्षेत्र 1518 ई. तक उसके अधिकार में रहे। फरीद ने बिहार के सुल्तान बहार खां लोहानी की सेवा प्राप्त कर ली। एक बार फरीद लोहानी के साथ शिकार पर गया, जहाँ उसने लोहानी के रक्षार्थ एक शेर मारा। उसकी बहादुरी से प्रसन्न होकर लोहानी ने उसे “शेर खां” की उपाधि दी। लोहानी अमीरों एवं अन्य अफगान सरदारों ने शेर खां के विरुद्ध बहार खां लोहानी के कान भरने शुरू कर दिए। फलस्वरूप शेर खा को निकाल दिया गया। 1527 ई. में शेर खां ने मुगलों की नौकरी कर ली। इस दौरान उसने मुगलों के प्रशासन और सैनिक संगठन के दोषों का अध्ययन किया। 1528 ई. में उसने मुगलों की नौकरी छोड़ दी। तब उसने दक्षिण बिहार के जलाल खां के रक्षक व शिक्षक के रूप में नौकरी की। 1528 ई. में बिहार के शासक की मृत्यु के पश्चात् शेर खां को वहां का नायब सूबेदार या वकील नियुक्त किया गया। कालान्तर में हुमायूं के साथ उसका संघर्ष हुआ और 1540 ई. में वह दिल्ली की गद्दी पर बैठा।

1541 ई. में शेरशाह सूरी ने गक्खरों के विरुद्ध एक अभियान छेड़ा। इस अभियान में वह गक्खरों की शक्ति को पूर्णतया नष्ट तो नहीं कर सका, किन्तु कम करने में अवश्य सफल हुआ। भारत की उत्तर-पश्चिम की रक्षा हेतु शेरशाह सूरी ने ‘रोहतास गढ़’ नामक दुर्ग बनवाया तथा वहां पर हैबात खां तथा खवास खां के नेतृत्व में अफगान सेना की टुकड़ी नियुक्त की। 1542 ई. में शेरशाह ने मालवा पर आक्रमण किया तथा इसे जीत लिया।

1542 ई. में रायसीन के शासक पूरनमल ने शेरशाह की अधीनता स्वीकार कर ली थी, किन्तु शेरशाह को सूचना मिली कि पूरनमल मुस्लिम लोगों से अच्छा व्यवहार नहीं करता। अतः 1543 ई. में शेरशाह की सेनाओं ने रायसीन को घेर लिया। पूरनमल व उसके सैनिक बड़ी वीरता से लड़े। शेरशाह ने चालाकी से काम लिया तथा पूरनमल को उसके आत्मसम्मान एवं जीवन की रक्षा का वायदा करके आत्मसमर्पण हेतु तैयार कर लिया। किन्तु, मुस्लिम जनता के आग्रह पर शेरशाह ने राजपूतों के खेमों को चारों ओर से घेर लिया। राजपूत लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। शेरशाह की पूरनमल और उसके परिवार के साथ व्यवहार करने के ढंग के की बड़ी निन्दा की गई है। 1543 ई. में हैबत खां के नेतृत्व में अफगान सेना ने मुल्तान तथा सिन्ध को जीत लिया।

सन् 1544 ई. में शेरशाह ने जोधपुर के शासक मालदेव के विरुद्ध अभियान छेड़ा। इस युद्ध में राजपूत सरदार ‘जयता’ और ‘कुप्पा’ ने अत्यन्त वीरता का प्रदर्शन किया। मालदेव हुमायूं को संरक्षण देना चाहता था, किन्तु शेरशाह ने उसे सचेत कर दिया। अतः मालदेव शेरशाह और हुमायूं दोनों को ही रुष्ट होने का अवसर न देकर तटस्थ रहा। शेरशाह मालदेव के व्यवहार से असन्तुष्ट था और उसको दंड देना चाहता था। शेरशाह ने मालदेव के विरुद्ध 1543 ई. में युद्ध आरम्भ कर दिया। वह मालदेव पर सरलता से विजय न पा सका। अंत में शेरशाह ने मालदेव और उसके अनुयायियों के मध्य फूट डलवा कर उसे पराजित किया। युद्ध इतना घोर था कि शेरशाह ने इस प्रकार की घोषणा की, “मैंने एक मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिन्दुस्तान का साम्राज्य लगभग खो दिया था। 

शेरशाह का प्रशासन

प्रशासन में शेरशाह को विभिन्न मंत्रालयों द्वारा सहायता प्राप्त होती थी। ये मंत्रालय थे

  1. दीवान-ए-वजारत – देश की आय और व्यय दोनों इसके अधीन थे। सामान्यतः यह अन्य मंत्रालयों की देखभाल भी करता था।
  2. दीवान-ए-आरीज – यह दीवाने ममालिक के अधीन था। वह सेना का अनुशासन, प्रबंध, भर्ती व वेतन संबंधी कार्य करता था।
  3. दीवान-ए-रसालत – यह विदेश मंत्रालय था। राजदूतों और राजप्रतिनिधि मंडलों से संपर्क स्थापित करना तथा राजनैतिक पत्र व्यवहार संबंधी कार्य भी यही करता था।
  4. दीवान-ए-इंशा – यह शाही घोषणा पत्र और संदेशों का रिकार्ड रखता था तथा सरकारी अभिलेखों का कार्यभारी था। राज्यपालों तथा अन्य स्थानीय अधिकारियों से पत्र व्यवहार यही करता था।
  5. दीवान-ए-काजी – यह विभाग मुख्य काजी के अधीन था। सुल्तान के के पश्चात् वह राज्य के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य करता था।
  6. दीवान-ए-बरीद – यह राज्य की डाक व्यवस्था एवं गुप्तचर विभाग की देखभाल किया करता था।

शेरशाह के उत्तराधिकारी

शेरशाह की अचानक मृत्यु हुई थी तथा उसके दो पुत्र आदिल और जलाल वहां पर उपस्थित नहीं थे। जलाल खां जो उसका छोटा पुत्र था, वहां पहले पहुंचा और अमीरों ने उसे राजा घोषित कर दिया। जलाल खां ने इस्लाम शाह की उपाधि धारण करके सिंहासन संभाला।

इस्लामशाह (1545-1553 ई. )

इस्लामशाह योग्य व शक्तिशाली था, परंतु वह स्वभाव से अविश्वासी व्यक्ति था। अमीर उसके विरुद्ध हो गए और इस्लामशाह के विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगे। खवास खां तथा इस्लामशाह का भाई आदिल खां पराजित होकर भाग गए तथा षड्यंत्रकारियों को इस्लामशाह ने कठोर दंड दिए। अपने पिता की भांति इस्लामशाह का शासन भी व्यक्तिगत योग्यता पर आधारित था. परंतु उसमें शेरशाह के गुणों का अभाव था।

मोहम्मद आदिल ( 1553-1556 ई.)

इस्लामशाह की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र फिरोज सिंहासन पर बैठा। किन्तु मुबारिज खां ने उसकी हत्या कर दी व स्वयं मोहम्मद आदिल की उपाधि धारण करके सिंहासन पर बैठा। उसके प्रधानमंत्री ‘हेमू’, जो रैवाड़ी की ‘धूसर’ जाति से संबंधित था, अपनी योग्यता द्वारा उच्चपद प्राप्त करके अपने स्वामी का विश्वासपात्र बन गया। उसने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण कर ली। हेमू विक्रमादित्य की उपाधि धारण करने वाला भारत का 16वा शासक था। देश में असंतोष फैला हुआ था तथा षड्यंत्र व राजद्रोह व्याप्त था। राजा के भतीजे सिकन्दर सूर ने दिल्ली, आगरा, मालवा, पंजाब और बंगाल पर अधिकार कर लिया तथा मोहम्मद आदिल के अधीन केवल गंगा के पूर्व स्थित प्रान्त ही रह गए।

शेरशाह सूरी

  1. शेरशाह का जन्म 1472 ई. में हुआ था।
  2. सूर साम्राज्य का संस्थापक शेरशाह सूरी था।
  3. इसके बचपन का नाम फरीद खां था।
  4. इसने रोहतासगढ़ किला,किला-ए-कुहना नामक मस्जिद का निर्माण करवाया था।
  5. इसका उत्तराधिकारी उसका पुत्र इस्लाम शाह हुआ।
  6. शेरशाह ने भूमि की माप के लिए 32 अंक वाला सिकंदरी गज और सन की डंडी का प्रयोग किया था।
  7. शेरशाहसूरी ने कबूलियत एवं पट्टा प्रथा की शुरुवात की थी।
  8. इसने ही 1541 ई. मै ही पाटलिपुत्र को पटना के नाम से पुनः स्थापित किया।
  9. शेरशाह ने ही ग्रैंड ट्रंक रोड की मरम्मत करवाई थी
  10. डाक-प्रथा का प्रचलन सेरसाह ने ही करवाया था।
  11. सेरसाह के समकालीन मलिक मुहम्मद जायसी थे।

अकबर (1556 – 1605 ई.)

15 अक्टूबर, 1542 ई. की विकट परिस्थितियों में हमीदा बानू बेगम के गर्भ से अकबर का जन्म हुआ था। हुमायूं शरणार्थी की दशा में भटक रहा था। अकबर का बचपन क्रमशः उसके चाचा अस्करी तथा कामरान के यहां बीता। अकबर पर्याप्त शिक्षा प्राप्त न कर सका, किन्तु सैनिक और प्रशासनिक कार्यों में व्यावहारिक निपुणता प्राप्त कर ली। 1551 ई. में मात्र 9 वर्ष की आयु में अकबर को हुमायूं ने मुनीम खां के संरक्षण में गजनी का गवर्नर नियुक्त किया। 1555 ई. में हुमायूं ने उसे लाहौर का गवर्नर बना दिया। हुमायूं की मृत्यु होने पर बैरम खां ने कालानौर (गुरुदासपुर. पंजाब) में 14 फरवरी, 1556 ई. को अकबर का राज्याभिषेक बैरम खाँ की देख-रेख में मिर्जा अबुल कासिम के द्वारा किया गया। उधर दिल्ली में हेमू ने मुगल गवर्नर तर्दीबेग खां को मार भगाया और दिल्ली पर अधिकार कर लिया। ऐसी स्थिति में अनेक सरदारों ने बैरम खां को अकबर सहित गजनी भाग जाने की सलाह दी, किन्तु बैरम खां और अकबर ने मुगल सेना सहित दिल्ली की ओर कूच किया।

पानीपत का दूसरा युद्ध (1556 ई.) 

यह युद्ध अकबर के वकील एवं संरक्षक बैरम खाँ और मुहम्मद आदिलशाह सूर के वजीर एवं सेनापति हेमू के मध्य 5 नवम्बर, 1556 ई. को पानीपत के मैदान में हुआ। आरम्भ में हेमू की सेना मुगलों पर भारी पड़ी, किन्तु दुर्भाग्यवश हेमू की आंख में तीर लग गयी तथा उसकी सेना में भगदड़ मच गई। हेमू को पकड़, कर उसका वध कर दिया गया। अकबर की विजय हुई तथा मुगल वंश की पुन: स्थापना की गई। 

अकबर के समय हुए विद्रोह

अकबर के समय अनेक विद्रोह हुए जिनमे से उजबेगों का विद्रोह, मिर्जा का विद्रोह, बंगाल एवं बिहार का विद्रोह, अफगान बलूचियों का विद्रोह, शाहजादा सलीम का विद्रोह आदि प्रमुक है

25-26 अक्टूबर, 1605 ई. की अर्द्धरात्रि को अकबर की अतिसार रोग (Dysentery) के कारण मृत्यु हो गई। उसे सिकन्दराबाद के मकबरे में दफनाया गया था।

महत्त्वपूर्ण तथ्य – 

  1. बाबर ने तुर्की भाषा में लिखी अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में केवल पांच मुस्लिम शासकों-दिल्ली, बंगाल, मालवा, गुजरात एवं बहमनी तथा मात्र दो हिन्दू शासकों- मेवाड़ एवं विजयनगर का उल्लेख किया है।
  2. पानीपत विजय से पूर्व बाबर भारत पर चार बार आक्रमण कर चुका था।
  3. बाबर ने मुसलमानों पर लगने वाले ‘तमगा’ नामक कर को समाप्त कर दिया।
  4. बाबर की आत्मकथा ‘बाबरनामा’ या ‘तुजुक-ए-बाबरी’ का अनुवाद इस्किन, अब्दुर्रहीम खानखाना ने फारसी में तथा श्रीमती वेबरिज ने अंग्रेजी में किया।
  5. बाबर ने काव्य संग्रह ‘दीवान’ (तुर्की भाषा) का संकलन करवाया।
  6. मुबइयान नामक पद्य शैली का विकास बाबर ने किया था। बाबर ने ‘रिसाल-ए-उजस’ या खत-ए-बाबरी की रचना की थी।
  7. लेनपूल ने हुमायूं की मौत पर टिप्पणी की है, “हुमायूं जीवन भर लड़खड़ाता रहा और लड़खड़ाते हुए अपनी जान दे दी।”
  8. हुमायूं ज्योतिष में विश्वास करता था। इसलिए वह सप्ताह के सात दिन अलग-अलग रंग के कपड़े पहनता था। वह प्राय: इतवार को पीला, सोमवार को सफेद, शनिवार को काला कपड़ा पहनता था।

धार्मिक विकास

अकबर की धार्मिक नीति का मूल उद्देश्य ‘सार्वभौमिक सहिष्णुता’ थी। अकबर प्रथम सम्राट था, जिसके धार्मिक विचारों में क्रमिक विकास दिखाई देता है।

उसके इस विकास को निम्नलिखित तीन कालों में बांटा जा सकता है।

प्रथम काल (1556-1575 ई.)

इस काल में अकबर इस्लाम धर्म का कट्टर अनुयायी था। वह दिन में पांच बार नमाज पढ़ता था तथा रमजान के महीने में रोजे रखता था। वह मुल्ला व मौलवियों का आदर करता था। इस्लाम की उन्नति हेतु उसने अनेक मस्जिदों का निर्माण करवाया, परंतु वह धार्मिक दृष्टि से असहनशील नहीं बना। उल्लेखनीय है कि इसी काल में अकबर ने राजपूत नीति अपनाई थी। वस्तुतः इस समय धर्म उसका व्यक्तिगत मामला था तथा राजपूत नीति आदि कार्य राजनीति से प्रेरित थे।

द्वितीय काल (1575-1582 ई.)

अकबर का यह काल धार्मिक दृष्टि से क्रांतिकारी काल था। इस काल में उसने ‘दीन-ए-इलाही’ धर्म तथा ‘इबादतखानों’ की स्थापना की। 1582 ई. में उसने ‘दीन-ए-इलाही’ को राजकीय धर्म घोषित कर दिया। ‘इबादतखाने’ में पहले केवल मुसलमान ही भाग लेते थे, किन्तु कालान्तर में सभी धर्मों के लिए इसे खोल दिया गया। इस काल में अकबर का आत्म चिन्तन बढ़ गया तथा उसने प्रत्येक शुक्रवार को मांसखाना छोड़ दिया। पशुबलि तथा मुल्ला और मौलवियों पर नियंत्रण रखने का प्रयास किया।

तृतीय काल (1582-1605 ई.) 

इस काल के दौरान अकबर पूर्ण रूप से ‘दीन-ए-इलाही’ में अनुरक्त हो गया। इस्लाम धर्म के प्रति उसकी निष्ठा कम हो गई। बदायूंनी का यह कथन कि ‘इस काल में अकबर ने कई इस्लाम विरोधी कार्य भी किए’ सही प्रतीत नहीं होता, क्योंकि सहिष्णुता के युग में अकबर द्वारा किसी धर्म विरोधी कार्य किया जाना संभव नहीं था।

महत्त्वपूर्ण तथ्य –

  1. शेरशाह ने अपने संपूर्ण साम्राज्य को 47 सरकारों में विभाजित किया। बंगाल के लिए अलग प्रकार की व्यवस्था के अंतर्गत उसे 19 सरकारों में बांटा गया।
  2. शेरशाह ने मालगुजारी (लगान) के अतिरिक्त किसानों से जरीबाना (सर्वेक्षण शुल्क) एवं महसिलाना (कर-संगह शुल्क) लिया जाता था, जो क्रमश: 2.5 प्रतिशत एवं 5 प्रतिशत होता था।
  3. किसान ‘कबूलियत-पत्र’ द्वारा पट्टे को स्वीकार करता था।शेरशाह प्रत्येक बुधवार की शाम को स्वयं भी न्याय करता था। 
  4. बैरम खां और अकबर के बीच तिलवाड़ा नामक स्थान पर युद्ध हुआ, जिसमें बैरम खां पराजित हुआ।
  5. मक्का जाते समय मुबारक खां नामक एक अफगान ने बैरम खाँ की हत्या कर दी। बैरम खां ने 1555 ई. में मच्छीवाड़ा के युद्ध में मुबारक खां के पिता का कत्ल कर दिया था।
  6. गढ़ कटगा के प्रसिद्ध हिन्दू राज्य की स्थापना अमनदास ने की थी। 
  7. चित्तौड़ विजय के उपलक्ष्य में अकबर ने ‘फतहनामा’ जारी किया।
  8. उसने गुजरात विजय की स्मृति में फतेहपुर सीकरी में बुलन्द दरवाजा का निर्माण कराया।

अकबर के कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य

  • दास प्रथा का अंत – 1562 ई.
  • ‘हरमदल’ से मुक्ति – 1562
  • तीर्थ यात्रा कर समाप्त – 1563
  • जजिया कर समाप्त – 1564
  • फतेहपुर सीकरी की स्थापना – 1571
  • राजधानी का आगरा से फतेहपुर सीकरी स्थानान्तरण – 1571
  • जागीरदारी प्रथा का अंत – 1575
  • इबादतखाने की स्थापना – 1575
  • इबादतखाना में सभी धर्मों को प्रवेश की अनुमति – 1578
  • महजर की घोषणा – 1579
  • दीन-ए-इलाही की स्थापना – 1582
  • ‘इलाही संवत्’ की स्थापना – 1583

महत्त्वपूर्ण तथ्य – 

  1. 1529 ई. में बंगाल के शासक नुसरत शाह को पराजित करने के पश्चात् शेरखां ने ‘हजरते आला’ की उपाधि धारण की ।
  2. 1530 ई. में शेरशाह ने चुनार के किलेदार ताजखां की विधवा ‘लाडमलिका’ से विवाह कर चुनार के शक्तिशाली किले पर अधिकार कर लिया।
  3. चौसा युद्ध के बाद उसने ‘शेरशाह’ की उपाधि धारण की एवं अपने नाम का खुतबा पढ़वाया तथा सिक्का चलाया। 
  4. शेरशाह ने शिकदारों की देखभाल के लिए ‘अमीर-ए-बंगाल’ या अमीन-ए-बंगला नामक असैनिक अधिकारी नियुक्त किया। उक्त पद सर्वप्रथम काजी फजीलात को दिया गया।

अकबर के दरबार के नौ रत्न

  1. बीरबल – इसका जन्म काल्पी में 1528 ई. में हुआ था। वास्तविक नाम महेश दास। अपनी वाक्पटूता तथा कुशाग्र बुद्धि के लिए प्रसिद्ध। 1586 में यसुफजाइयों के हमले में मारा गया।
  2. टोडरमल – दीवान तथा भूराजस्व व्यवस्था में जब्ती व्यवस्था के प्रवर्तक। 
  3. तानसेन – अकबर के राजकवि तथा प्रसिद्ध संगीतकार। इसी के काल में ध्रुपद गायन शैली का विकास हुआ।
  4. मुल्ला दो प्याजा – वाकपटुता के लिए प्रसिद्ध अरब का रहने वाला था। 
  5. अब्दुलरहीम खानखाना – बैरम खां का पुत्र था। खानखाना उसकी उपाधि थी। हिन्दी तथा फारसी का प्रकांड विद्वान तथा सलीम का गुरू ।
  6. हकीम हुमाम – अकबर का घनिष्ट मित्र तथा शाही पाठशाला का प्रमुख।
  7. अबुल फजल – प्रसिद्ध कवि, अकबरनामा का रचयिता, शेख मुवारक का पुत्र। 1602 ई. में सलीम के ईशारे पर वीर सिंह बुंदेला ने इसकी हत्या कर दी।
  8. राजा मान सिंह – प्रसिद्ध राजपूत सेनानायक।
  9. फैजी – उच्च कोटि के कवि तथा साहित्यकार, अबुल फजल का बड़ा भाई था। गणित की प्रसिद्ध पुस्तक लीलावती एवं अनेक ग्रंथों का फारसी में अनुवाद किया

अकबर

  1. अकबर का जन्म 15 अक्टुम्बर 1542 ई. को हुआ था। इसका बचपन का नाम जलाल था।
  2. पानीपत की दूसरी लड़ाई 5 नवंबर 1556 ई. को अकबर और हेमू के बिच हुयी थी, इसमें अकबर विजय रहा था।
  3. हल्दीघाटी का युध्द 18 जून 1576 ई. को मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप एवं अकबर के बीच हुआ था, जिसमे अकबर विजय रहा था।
  4. अकबर का सेनापति मानसिंह था।
  5. धर्म दिन-ए-इलाही का प्रधान पुरोहित अकबर था।
  6. दिन-ए-इलाही धर्म स्वीकार करने वाला प्रथम एवं अंतिम हिन्दू शासक बीरबल था।
  7. राजस्व प्राप्ति की जब्ती प्रणाली अकबर के शासन काल में प्रचलित थी।
  8. राजा टोडरमल ने 1580 ई. में दहसाल बंदोबस्त व्यवस्था लागु की थी।
  9. प्रसिद्ध संगीतकार तानसेन अकबर के दरबार में ही था।
  10. प्रसिद्ध चित्रकार अब्दुर समद अकबर के दरबार में  ही था।
  11. अकबर की शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषता मनसबदारी प्रथा थी।
  12. इसके समकालीन प्रसिद्ध सूफी संत सेख सलीम चिश्ती थे।
  13. इसकी मृत्यु 16 अक्टुम्बर 1605 ई. में हुयी थी।इसके द्वारा बनाई गयी कृतियाँ – आगरा का लालकिला, हुमायूँ का मकबरा, दीवानेखास, पंचमहल, बुलंद दरवाजा, जोधाबाई का महल, लाहौर का किला।
  14. अकबर के 9 रत्न – अबुल फजल, फेजी, बीरबल, तानसेन, राजा मानसिंह,टोडरमल, अब्दुल रहीम, खान-ए-खाना, अजीउद्दीन, मुल्ला दो प्याजा 
  15. इसने तानसेन को कण्ठाभरण वाणीविलास की उपाधि दी थी।
  16. अकबरनामा ग्रंथ की रचना अबुल फजल ने की थी।
  17. बीरबल की हत्या यूसुफजाईयो के विद्रोह को दबाने के दौरान हो गयी थी।
  18. इसने ही अनुवाद विभाग की स्थापना की थी।
  19. अकबर के काल को हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल कहा जाता है।

जहाँगीर (1605-1627 ई.)

‘मोहम्मद सलीम’ का जन्म 30 अगस्त, 1569 ई. को फतेहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्ती’ की कुटिया में हुआ था। उसकी माता भारमल की पुत्री ‘मारियम उज्जमानी थी। अकबर उसे ‘शेखूबाबा’ कह कर पुकारता था। चार वर्ष की अवस्था में सलीम की शिक्षा का अच्छा प्रबंध किया गया। उसके शिक्षकों में प्रमुख अब्दुर्रहीम खानखाना था। 13 फरवरी, 1585 ई. में सलीम (जहाँगीर) का विवाह राजा भगवान दास की पुत्री मानवाई से हुआ। शाहजादा खुसरो मानबाई का ही पुत्र था। उसने राजा उदयसिंह की पुत्री जोधाबाई से भी विवाह किया।

1600 ई. में जब अकबर दक्षिण में असीरगढ़ के किले को जीतने में व्यस्त था तो शाहजादा सलीम ने खुलेआम विद्रोह करके स्वयं को इलाहाबाद का सम्राट् घोषित कर दिया। 1602 ई. में सलीम ने वीर सिंह बुन्देला से अबुल फजल की हत्या करवा दी, किन्तु बाद में अकबर से उसने माफी मांग ली तथा उसे क्षमा कर दिया गया। 1604 ई. में शाहजादा दानियाल की मृत्यु हो गई, अतः सलीम अकबर का इकलौता जीवित पुत्र रह गया। 21 अक्टूबर, 1605 ई. को अकबर ने सलीम को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। अकबर की मृत्यु के पश्चात् आठवें दिन 3 नवम्बर, 1605 ई. को आगरे के किले में सलीम का राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ। उसने ‘नूरुद्दीन मोहम्मद जहाँगीर बादशाह गाजी’ की उपाधि धारण की।

सलीम ने ‘जहाँगीर’ या ‘विश्व विजयी’ की उपाधि धारण की। उसने अनेक बंदियों को मुक्त कर दिया तथा अपने नाम के सिक्के चलवाए। उसने अपनी नीति को घोषणा जहाँगीर ने आगरे के किले की शाह बुर्ज और यमुना के किनारे एक पत्थर के स्तम्भ के मध्य ‘न्याय की जंजीर’ (जो शुद्ध सोने की बनी थी तथा लगभग 30 गज लंबी थी जिसमें 60 घंटिया थीं. स्थापित करने की आज्ञा दी ताकि दुःखी जनता अपनी शिकायतों को सम्राट के सम्मुख रख सके।

जहाँगीर के प्रमुख विद्रोह

जहाँगीर के प्रमुख विद्रोह में शाहजादा खुसरो का विद्रोह (1606 ई.), मेवाड़ का युद्ध, किश्तवार की विजय (1622 ई. ), अहमदनगर से युद्ध (1610-1620 ई.), शाहजहां का विद्रोह (1623-25 ई. ) प्रमुक है

जहांगीर की मृत्यु (1627 ई. )

अत्यधिक शराब पीने से जहांगीर अस्वस्थ हो गया था। वह स्वास्थ्य को कश्मीर और काबुल में रहकर सुधारने के प्रयत्न में था। जब वह कश्मीर से काबुल जा रहा था तो अत्यधिक सर्दी के कारण लाहौर | की ओर लौट गया। किन्तु मार्ग में ही 7 नवम्बर, 1627 ई. को भीमवार नामक | स्थान पर उसकी मृत्यु हो गई। उसके शव को शाहदरा (लाहौर) में दफनाया गया। जहांगीर के दरबार में विलियम हॉकिन्स (1608 ई.), विलियम फिंच, सर थॉमस रो (1615 ई.) एवं एडवर्ड टैरी जैसे यूरोपीय यात्री आये थे। जहांगीर के पांच पुत्र थे– (1) खुसरो, (2) परवेज, (3) खुर्रम, (4) शहरयार तथा (5) जहांदार। 

जहाँगीर

  1. इसका जन्म 30 अगस्त 1569 ई. को हुआ था।
  2. जहाँगीर ने ही न्याय की जंजीर चलाई थी।
  3. इसने ही खुसरो को सहायता देने के कारण सिक्खो के 5 वे गुरु अर्जुनदेव की हत्या करवा दी थी।
  4. जहाँगीर के शासनकाल में ही मुग़ल चित्रकला पर जोर दिया गया।
  5. अस्मत बेगम ने गुलाब से इत्र निकलने की विधि खोजी थी।
  6. जहाँगीर के 5 पुत्र थे – खुसरो, खुर्रम, परवेज, सहरयार, जहाँदार थे ।
  7. इसके समय को चित्रकला का स्वर्णकाल कहा जाता है ।
  8. नूरजहाँ ने ही जहाँगीर के मकबरे का निर्माण करवाया था।
  9. जहाँगीर के समय में ही कैप्टन हॉकिन्स, विलियम फिंच, सर टॉमस रो, एवं एडवर्ड टेरी जैसे यात्री आये थे।

शाहजहां (1627-1658 ई.)

शाहजहां के बचपन का नाम खुर्रम था। उसका जन्म 1592 ई. में लाहौर में एक हिन्दू माता के गर्भ से हुआ था। वह बड़ा महत्त्वाकांक्षी और प्रतिभाशाली व्यक्ति था। 1612 ई. में उसका विवाह आसफ खां की पुत्री ‘अर्जुमन्दबानो बेगम’ ( मुमताजमहल ) से हुआ, परंतु नूरजहां की पुत्री का विवाह शाहजादा शहरयार से होने के कारण नूरजहां का व्यवहार पक्षपातपूर्ण हो गया। 1622 ई. में शाहजहां के विद्रोह का यही कारण था। 1627 ई. में जब जहांगीर की मृत्यु हुई तो सिंहासन पर बिठाने हेतु नूरजहां ने शहरयार का और आसफ खां ने शाहजहां का पक्ष लिया। शाहजहां उस समय दक्षिण में था तथा शीघ्र वहां नहीं पहुंच सकता था। परिणामस्वरूप आसफ खां ने अंतरिम प्रबंध के रूप में खुसरो के पुत्र दावरबख्श को सिंहासन पर बिठाया। नूरजहां ने सार्वजनिक जीवन से अवकाश प्राप्त कर लिया तथा शहरयार को बंदी बना लिया गया। 1628 ई. में शाहजहां के आगमन पर उसका राज्याभिषेक हुआ और दावरबख्श को फारस भेज दिया गया। सौभाग्यवश दावरबख्श अपना जीवन बचाने में सफल रहा। 1645 ई० में नुरजहा की मृत्यु हो गयी 

शाहजहां के प्रमुख विद्रोह

शाहजहां के प्रमुख विद्रोह में बुन्देला राजपूतों का विद्रोह, खानेजहां लोदी का विद्रोह ( 1628 ई.), 1630 ई. का दुर्भिक्ष विद्रोह, पुर्तगालियों के साथ विद्रोह (1631-1632 ई.), बीजापुर के साथ युद्ध (1631 ई.), गोलकुण्डा विद्रोह, उत्तराधिकार का युद्ध (1657-1659 ई.) आदि प्रमुक विद्रोह है

महत्त्वपूर्ण तथ्य –

  1. शाहजहां के अंतिम आठ वर्ष आगरा के शाहबुर्ज किले में बीते। इस दौरान उसकी बड़ी पुत्री जहांआरा ने साथ रहकर उसकी सेवा की।
  2. 1666 ई. में उसकी मृत्यु बाद उसे साधारण नौकरों द्वारा ताजमहल में उसकी पत्नी की कब्र के साथ ही दफना दिया गया।
  3. 1636 ई. में गोलकुण्डा की संधि के फलस्वरूप शाहजहां का नाम खुतबे और सिक्कों दोनों में शामिल हुआ।
  4. मुहम्मद सैय्यद (मीर जुमला-फारसी व्यापारी) गोलकुण्डा का वजीर था। वह नाराज होकर मुगलों की सेवा में चला गया था। इसी (मीर जुमला) ने शाहजहां को प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भेंट किया था।
  5. 1657 ई. में शाहजहां के बीमार पड़ने पर हुए उत्तराधिकार के युद्ध में उसकी तीनों पुत्रियों ने भी हिस्सा लिया। जहांआरा ने दारा शिकोह, रोशनआरा ने औरंगजेब तथा गोहनआरा ने मुरादबख्श का पक्ष लिया।
  6. औरंगजेब और मुराद के बीच हुए ‘अहदनामा’ समझौता में दारा को ‘रईस-अल-मुलाहिदा’ (अपधर्मी शाहजादा) कहा गया था।
  7. दारा के साथ इस अपमानजनक व्यवहार का बर्नियर चश्मदीद गवाह था। उसने कहा कि “विशाल भीड़ एकत्र थी, सर्वत्र मैंने लोगों को रोते बिलखते तथा दारा के भाग्य पर शोक प्रकट करते हुए देखा।”
  8. शाहजहां ने ‘इलाही संवत्’ की जगह ‘हिजरी संवत्’ चलाया।
  9. शाहजहाँ ने हिन्दुओं पर तीर्थयात्रा कर लगाया (कुछ समय के लिए) तथा अकबर एवं जहांगीर के गो-हत्या निषेध के आदेश को समाप्त कर दिया।
  10. शाहजहाँ ने पुर्तगालियों से युद्ध होने पर आगरा के गिरजाघरों को तुड़वा दिया।
  11. शाहजहां ने 1634 ई. में पाबंदी लगा दी गई कि कोई मुसलमान लड़की तब तक हिन्दू मर्द से विवाह नहीं कर सकती, जब तक कि वह इस्लाम धर्म स्वीकार न कर ले।
  12. गंगा लहरी तथा रस गंगाधर के लेखक पंडित जगन्नाथ उसके राजकवि थे। चिन्तामणि, सुंदरदास कविन्द्राचार्य भी उसके दरबारी कवि थे।

औरंगजेब ने सितम्बर, 1658 ई. में शाहजहां को भी कैद कर लिया तथा 31 जनवरी, 1666 ई. को 74 वर्ष की अवस्था में कैदी के रूप में ही शाहजहां की मृत्यु हुई। शाहजहां को ताजमहल में मुमताजमहल के बगल में दफनाया गया। औरंगजेब ने अपने तीनों भाइयों को रास्ते से हटा दिया था। मुराद को दावत पर बुलाकर नशे की अवस्था में बंदी बना लिया गया तथा 1661 ई. में ग्वालियर में उसकी हत्या कर दी गई। शाहशुजा पराजित होकर अराकान भाग गया, जहां मघों ने उसकी हत्या कर दी। दाराशिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह ने भी विद्रोह कर दिया था। उसे दिसम्बर, 1660 ई. में बंदी बना लिया गया तथा ग्वालियर के किले में उसे अफीम खिला-खिला कर मार डाला गया। दारा का पुत्र सिफर शिकोह भाग्यशाली निकला। बाद में उसका विवाह औरंगजेब की पुत्री से कर दिया गया। 

शाहजहाँ

  1. शाहजहाँ का जन्म 5 जनवरी 1592 ई. को लाहौर में हुआ था ।
  2. जहाँगीर के बाद सिंहासन पर शाहजहाँ बैठा था।
  3. शाहजहाँ ने ही अपनी बेगम मुमताज महल की याद में ताजमहल का निर्माण आगरा में अपनी कब्र के ऊपर करवाया था 
  4. ताजमहल की रूप रेखा तैयार का श्रेय उस्ताद ईशा को जाता है ।
  5. उस्ताद अहमद लाहोरी ने  ताजमहल का निर्माण किया था ।
  6. शाहजहाँ के शासनकाल को स्थापत्यकला का स्वर्णयुग कहा जाता है।
  7. इसने ही मयूर सिंहासन का निर्माण करवाया था इसके मुख्य कलाकार बे बादल खां थे ।
  8. शाहजहाँ द्वारा बनाई गयी प्रमुख इमारते – दिल्ली का लाल किला व जामा मस्जिद, दीवाने आम,  दीवाने खास, आगरा का मोती मस्जिद, ताजमहल और शीश महल आदि है।
  9. आगरा की जामा मस्जिद का निर्माण शाहजहाँ की पुत्री जहाँआरा ने कराया।
  10. शाह बुलंद इकबाल के रूप मै दारा शिकोह को जाना जाता है ।

औरंगजेब आलमगीर (1658-1707 ई.)

मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब का जन्म 3 नवम्बर, 1618 ई. में ‘उज्जैन’ के निकट ‘दोहद’ नामक स्थान पर मुमताजमहल के गर्भ से हुआ था। उसने कुरान, अरबी, फारसी, तुर्की तथा हिन्दी का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। सैनिक शिक्षा में भी उसने योग्यता प्राप्त की थी। बुंदेलखण्ड के राजा जुझार सिंह के विद्रोह का उसने दमन किया। 1636 ई. से 1644 ई. तक तथा 1652 ई. से 1658 ई. तक औरंगजेब दक्षिण का राज्यपाल रहा। वह मुल्तान (1640 ई.) तथा गुजरात (1645) ई.) का गवर्नर भी रहा। अपने भाइयों से निपटने के पश्चात् औरंगजेब ने 31 जुलाई, 1658 ई. को आगरा में पहली बार तथा जून, 1659 ई. में दूसरी बार दिल्ली में अपना औपचारिक राज्याभिषेक ‘अकल मुजफ्फर आलमगीर’ की उपाधि के साथ करवाया। औरंगजेब ने सर्वप्रथम अनेक करों तथा ‘राहदारी’, ‘पिण्डारी’ अर्थात् ‘भूमिकर’ तथा ‘गृहकर’ आदि लगभग 18 करों को समाप्त कर दिया। खाफी खां ने इनमें से केवल 14 करों का उल्लेख किया है। उसने सिक्कों पर ‘कलमे’ को लिखा जाना बंद करवा दिया, जिससे गैर-मुस्लिमों के छुए जाने से यह अपवित्र न हो जाए। उसने फारस के ‘नौरोज’ के त्योहार का मनाया जाना बंद करवाया तथा प्रजा के चरित्र की निगरानी करने हेतु ‘मुहतसिब’ नियुक्त किए।

औरंगजेब के प्रति विद्रोह

औरंगजेब के प्रति विद्रोह में अफगान विद्रोह (1667), जाट विद्रोह (1667-1685 ई.), सतनामी विद्रोह, बुंदेला विद्रोह, राजपूतों का विद्रोह, सिक्ख विद्रोह आदि प्रमुख विद्रोह है

महत्त्वपूर्ण तथ्य – 

  1. अफगान सर्वप्रथम जहांगीर के काल में ही मुगलों के मित्र हुए। उन्हें भी मनसबदार बनाया जाने लगा। इसी के काल में भारतीय मुसलमान, जिन्हें शेखजादा कहा जाता था, को भी मनसबदार बनाया जाने लगा।
  2. जहांगीर ने हॉकिन्स को 400 का मनसब दिया था।
  3. जहांगीर ने ही सर्वप्रथम मराठों के महत्व को समझा तथा उन्हें मुगल अमीर वर्ग में शामिल किया।
  4. मुगलों की दक्षिण विजय में सबसे बड़ी बाधा अहमदनगर के योग्य वजीर मलिक अम्बर की उपस्थिति थी।
  5. नूरजहां ने एक ‘जुन्ता गुट’ बनाया था, जिसमें उसका पिता एत्मादुद्दौला, माता अस्मत बेगम, भाई आसफ खां तथा शाहजादा खुर्रम शामिल थे।
  6. नूरजहां जहांगीर के साथ झरोखा दर्शन देती थी, सिक्कों पर बादशाह के साथ उसका भी नाम अंकित होता था और शाही आदेशों पर बादशाह के साथ उसका भी हस्ताक्षर होता था।
  7. नूरजहां की मां अस्मत बेगम ने इत्र बनाने की विधि का आविष्कार किया था।
  8. नूरजहां ने अपना अंतिम जीवन 2 लाख रुपये प्रतिवर्ष की पेंशनभोगी बनकर लाहौर में बिताया। 1645 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
  9. जहांगीर के काल में 1622 ई. में कन्धार को फारस के शाह ने मुगलों से छीन लिया था।

महत्वपूर्ण तथ्य –

  1. अकबर ने जैन धर्म के आचार्य हरिविजय सूरि को ‘जगतगुरु’ तथा जिनचन्द्र सूरि को ‘युग प्रधान’ की उपाधि दी थी।
  2. अकबर ने तीसरे सिक्ख गुरु अमरदास से भेंट की तथा उसकी पुत्री के नाम कई गांव प्रदान किए।
  3. 1577 ई. में अकबर ने सिक्ख गुरु रामदास को 500 बीघा जमीन प्रदान की। कालांतर में यहीं अमृतसर नगर बसा तथा स्वर्ण मंदिर का निर्माण हुआ।
  4. फतेहपुर सीकरी का खाका बहाउद्दीन ने तैयार किया था। 
  5. अकबर के दरबार में तीन बार जेसुइट मिशन आया, जिसमें पहली बार 1580 ई. में (फतेहपुर सीकरी) आए मिशन का नेतृत्व एक्वाबीवा ने किया था।
  6. सलीम ने मानबाई को ‘शाहे बेगम’ का पद प्रदान किया था। बाद में सलीम की आदतों से (अधिक शराब पीने के कारण) परेशान होकर शाहे बेगम (मानबाई) ने आत्महत्या कर ली।
  7. उसकी 12 घोषणाओं को ‘आइने-ए-जहांगीरी’ कहा जाता है। इन घोषणाओं में एक ऐम्मा (भूमि का प्रमाणीकरण) था जो ‘वाक्याते जहांगीरी’ में प्रार्थना एवं प्रशंसा के लिए दी गई भूमि के रूप में वर्णित है।
  8. जहांगीर ने अनेक अभियानों के बाद अंतत: 1617 ई. में खुर्रम को अहमदनगर अभियान पर भेजा तथा खुद माण्डू पहुंच गया। बीजापुर के शासक की मध्यस्थता के कारण संधि हो गयी।
  9. इस संधि के फलस्वरूप जहांगीर ने खुर्रम को ‘शाहजहां’ तथा बीजापुर के शासक को ‘फर्जन्द’ (पुत्र) की उपाधि दी।
  10. जहांगीर ने श्रीकांत नामक एक हिन्दू को हिन्दुओं का जज नियुक्त किया।
  11. जहांगीर ने सूरदास को प्रश्रय दिया था तथा उसी के संरक्षण में ‘सूरसागर’ की रचना हुई।

औरंगजेब

  1. औरंगजेब का जन्म 24 अक्टूम्बर 1618 ई.को गुजरात के दोहाद नामक स्थान पर हुआ था।
  2. यह सुन्नी धर्म को मानता था, इसलिए इसे जिन्दा पीर कहा जाता है।
  3. औरंगजेब के गुरु मीर मुहम्मद हकीम थे ।
  4. इस्लाम नहीं स्वीकार करने के कारण सिक्खो के 9 वे गुरु तेगबहादुर की हत्या औरंगजेब ने 1675 ई.में दिल्ली  में करवा दी थी।
  5. औरंगजेब ने 1679 ई. में जजिया कर को पुनः लागू किया था।
  6. बीबी का मकबरा का निर्माण 1679 ई. में औरंगजेब ने औरंगाबाद में करवाया था ।
  7. 1685 ई. में बिजापुर एवं 1687 ई. में गोलकुण्डा को औरंगजेब ने मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया था।
  8. औरंगजेब ने ही दरबार में संगीत पर पाबन्दी लगा दी थी तथा सरकारी संगीतो को अवकाश दे दिया था
  9. औरंगजेब स्वयं बीणा बजाने मै माहिर थे ।
  10. इसने ही 1665 ई. में हिन्दू मंदिरो को तोड़ने का आदेश दिया था ।
  11. औरंगजेब की मृत्यु 20 फरबरी 1707 ई. को हुयी, इसके समय सुबो की संख्या 20 थी ।

मुगलकालीन विदेशी यात्री

यात्रीशासकविवरण
रॉल्फ फिंच ( प्रथम ब्रिटिश यात्री)अकबरआगरा शहर फतेहपुर सिकरी से बड़ा तथा दोनों लंदन से भी बड़ा है।
फादर ऐंथोनी मोंसेरात (पुर्तगाली)अकबरलाहौर शहर यूरोपीय नगरों के समान सुंदर है, (यह शाहजादा मुराद का शिक्षक था)।
विलियम हॉकिंस (ब्रिटिश)जहांगीरजहांगीर के आगरा दरबार में आने वाला प्रथम अंग्रेज
विलियम फिंच (ब्रिटिश),,,,,,,इसने अनारकली की दंतकथाओं का उल्लेख किया है।
सर टॉमस रो (ब्रिटिश),,,,,,,‘पूर्वी द्वीपों की यात्रा’ नामक विवरण में मुगल दरबार के षड्यंत्र का विवरण दिया है।
एडवर्ड टेरी (ब्रिटिश),,,,,,,बादशाह कहीं भी हो गंगाजल ही पीता है, इसने यहाँ के सिक्कों का विवरण दिया है।
निकोलस डाऊँटन,,,,,,,यह आगरा नहीं जा पाया था। इसका विवरण गुजरात पर केन्द्रित है।
निकोलस विलिंगटन,,,,,,,यात्रा विवरण — ट्रैक्टेट।
थामस कायर्त (ब्रिटिश),,,,,,,स्त्रियों के मीना बाजार का चित्रण किया है।
फ्रांसिस्को पेलसार्ट (डच),,,,,,,बयाना में नील का उत्पादन होता (आगरा में डच टकसाल का अध्यक्ष) है।
पियेत्रा देला वाले (इटली),,,,,,,इसने सूरत, अहमदाबाद तथा खंभात का विवरण दिया (सती प्रथा के बारे में विवरण) है।
जीन वैप्टिस्ट ट्रैवर्नियर (फ्रांसीसी),,,,,,,यह पेशे से जौहरी था तथा कोहीनूर हीरे का विवरण दिया है। इसका यात्रा विवरण ट्रेवल्स इन इंडिया है।
मनूची (इटली)शाहजहाँइसका संस्मरण स्टोरियो दो मोगोर नाम से जाना जाता है। इसने दारा शिकोह के पास तोपची की नौकरी की थी।
फ्रांसिस वर्नियर (फ्रेंच)शाहजहाँयात्रा विवरण – ‘ट्रैवलस इन द मुगल एम्पायर’ इसने उत्तराधिकार संघर्ष का जीवंत विवरण दिया है।

दोस्तों, आज हमने आपको मुगल साम्राज्य का संपूर्ण इतिहास । The Mughal Empire In Hindi, बाबर, हुमायूँ, शेरशाह सूरी, अकबर, जहाँगीर , शाहजहाँ, औरंगजेब के बारे मे बताया, आशा करता हूँ आपको यह आर्टिकल बहुत पसंद आया होगा, तो दोस्तों मुझे अपनी राय कमेंट करके जरूर बताये, ताकि मुझे और अच्छे आर्टिकल लिखने का अवसर मिले धन्यवाद्।

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