मृदा प्रदूषण (Soil Pollution In Hindi)
मृदा प्रदूषण (Soil Pollution In Hindi)

हेलो दोस्तों, हमारे ब्लॉक में आपका स्वागत है, आज हम जानेंगे मृदा प्रदूषण क्या है? (Soil Pollution In Hindi) मृदा प्रदूषण के कारण और मृदा प्रदूषण के प्रभाव तथा मृदा प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय एवं जीवमंडल क्या है? (Biosphere In Hindi) तथा जीवमण्डल में ऊर्जा तथा अजैवीय घटकों का प्रभाव।

मृदा प्रदूषण (Soil Pollution In Hindi)

 

मृदा प्रदूषण क्या है? (Soil Pollution In Hindi)
मृदा प्रदूषण क्या है? (Soil Pollution In Hindi)

 

मृदा प्रदूषण क्या है? (Soil Pollution In Hindi)

मृदा में विभिन्न प्रकार के लवण खनिज पदार्थ , कार्बनिक पदार्थ, गैसे एवं मृदा जल का एक निश्चित मात्रा एवं अनुपात में होते हैं मृदा में इन पदार्थों की मात्रा एवं अनुपात में किन्ही कारणों से उत्पन्न अवांछनीय परिवर्तन मृदा प्रदूषण कहलाता है ।

मृदा प्रदूषण के कारण (Mrida Pradushan ke Karan)

1 – घरों से निकलना कूड़ा करकट तथा अपशिष्ट पदार्थ

2 – सीसा तांबा पॉलिथीन की थैलियां कागज सड़ा हुआ भोजन पारा आदि।

3 – अधिक मात्रा में कीटनाशक पदार्थों व उर्वरकों का प्रयोग ।

4 – कारखानों से निकले अपशिष्ट पदार्थ ।

5 – खुले स्थानों पर मल विसर्जन करना।

6 – परमाणु परीक्षण तथा परमाणु संस्थानों से रिसाव आदि।

मृदा प्रदूषण के प्रभाव (Mrida Pradushan ke Prabhav)

1 – मृदा प्रदूषण के कारण भूमि बंजर हो जाती है जिससे फसल उत्पादन कम हो जाता है ।

2 – मृदा प्रदूषण पौधों के अंदर पहुंचकर खाद्य श्रंखला के माध्यम से मानो या जंतु शरीर में पहुंचकर अनेक गंभीर रोग उत्पन्न करते हैं ।

मृदा प्रदूषण के उपाय (Mrida Pradushan ke Upay)

1 – कृषि में उर्वरकों के बजाएं कंपोस्ट खाद का प्रयोग करना चाहिए

2 – परमाणु विस्फोटों पर रोक लगानी चाहिए परमाणु संस्थानों से रिसाव ना करें इसके लिए और अधिक सुरक्षित उपाय करें।

3 – गांव में गोबर गैस सयंत्र लगाना चाहिए।

4 – पेड़ पौधों के कटाव पर नियंत्रण होना चाहिए ।


 

जीवमंडल (Biosphere In Hindi) 

 

जीवमंडल क्या है? (Biosphere In Hindi) 
जीवमंडल क्या है? (Biosphere In Hindi)

 

जीवमंडल क्या है? (Biosphere In Hindi) 

जल थल तथा वायु का वह भाग जहां जीवन संभव है जीवमण्डल कहलाता है जीवमण्डल समुद्र तल से लगभग 6 किमी वायुमण्डल में पृथ्वी के पृष्ठतल से 8 किमी गहराई तक समुद्र में फैला है तथा जल स्थल तथा वायु के इस 14 किमी विस्तार को जिसमें जीवधारी पाए जाते हैं जीवमण्डल कहते हैं जीवमण्डल एक ऐसी इकाई है जिसमें जलमण्डल थलमण्डल तथा वायुमण्डल आते हैं मनुष्य जीवमण्डल का एक भाग है और अपनी दैनिक आवश्यकताओ के लिए जीवमण्डल के विभिन्न घटकों पर निर्भर होता है ।

जीवमण्डल में ऊर्जा तथा अजैवीय घटकों का प्रभाव

प्रत्येक पारितंत्र में जैवीय घटकों की उपस्थिति आवश्यक है इन जैवीय घटकों में परस्पर विभिन्न प्रकार के संबंध होते हैं जिनमें भोजन प्राप्त करने के लिए जीवो के मध्य बने आपसी संबंध सम्मिलित हैं दूसरी और प्रत्येक जीव को जीवन से संबंधित क्रियाओं के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है ऊर्जा भोजन के रूप में प्रत्येक जीव में प्रवेश करती है इस भोजन या खाद्य पदार्थों का निर्माण पारितंत्र में उपस्थित हरे पौधे पर्णहरिम की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा सौर ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा के रूप में अनुबंधित कर लेते हैं इस प्रकार सूर्य का प्रकाश ही पृथ्वी पर तथा उसके पारितंत्र के लिए ऊर्जा का एकमात्र स्रोत है पोषण की इस विधि को जिसमें ऊर्जा संचित करके कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल जैसे सरल पदार्थों से खाद्य पदार्थों का निर्माण किया जाता है और जो हरे पौधों को स्वपोषी बना देती है पोषण की प्रथम रीति कहते हैं क्योंकि पौधे उर्जा को भोजन के रूप में अधिक मात्रा में संचित करते हैं इसलिए उन्हें उत्पादक कहते हैं ।

 

प्राकृतिक संसाधन का संरक्षण (Prakritik Sansadhan ka Sanrakshan)

”प्राकृतिक पारितंत्र का कोई भी घटक जिसका उपयोग मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए करता है”, प्राकृतिक संसाधन कहलाता है।

प्राकृतिक सम्पदाओं के संरक्षण के लिए उनके दोहन में सीमित तथा नियमित करना होगा कुछ आवश्यक सरक्षण निम्नलिखित विधियों द्वारा किये जाने चाहिए ।

वन संरक्षण (Van Sanrakshan) –

वनों के विनाश से भूमि का अपरदन होता है जल का क्षरण होता है तथा बाढ़ आने का खतरा बढ़ जाता है वनों का संरक्षण अति आवश्यक है वनों को आग से बचाना चाहिए ।

भूमि संरक्षण (Bhumi Sanrakshan) –

भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाए रखना तथा मृदा अपरदन रोकना ही भूमि संरक्षण कहलाता है इसके लिए फसल चक्र को अपनाना चाहिए सघन फसल को बोते रहना चाहिए मृदा अपरदन को रोकने के लिए वृक्षारोपण करना चाहिए।

जल संरक्षण (Jal Sanrakshan) –

वृक्षारोपण तथा जंगलों को सुरक्षित रखना जल संरक्षण के लिए आवश्यक है वृक्ष भूमिगत जल भण्डार को बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है क्योंकि जल पौधों की जड़ों के सहारे भूमि में अधिक मात्रा में चला जाता है।

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